Thursday, 23 June 2011

रिश्ते घाव --------------(राखी के अवसर पर )

सुबह्से बारिश की फुहार व गरजते मेघों ने आसमान को एक काला आवरण सा ओढा दिया था | कड़कती बिजली व बादलों की गर्जन वातावरण को एक भयानक रूप प्रदान कर रहे थे | मन में एक विचार उपजा की मेघों का यह तांडव देख न जाने कितने शिशु डर कर अपनी माँ के आँचल में छिप गए होंगे|
मन बहलाने को t .v चलाया तो बहुत ही प्यारा गीत सुनाई दिया  "अब के बरस भेज भैया को बाबुल सावन में लीजो बुलाय रे",बीते बरस कोई चिठिया न आयी ,न कोई पीहर से आये ,थी में तेरी नाजों की पाली फिर क्यूँ हुई मैं पराई"--------मन रम गया इसके बोलों में और न जाने कब आखें बरसने लगी |     बह चली मैं अश्रु - की धार से बचपन की ओर जो निगोड़ा न जानेकब ,कैसे इतनी जल्दी बीत गया ,फिर पलट कर भी न देखा |अब तो बस उस दुलार का अहसास ही बचा है ,जो कभी सहला देता है मन को ,तो कभी भिगो जाता है पलकों को |

सच बाबुल यदि हम होती हैं तुम्हारी नाजों से पाली तो क्यूँ करते हो हमे यूँ परायी? पराई भी इतनी की तुम और माँ ने दूर जा हमसे -न जाने कहाँ बसेरा डाल लिया?   जाते -२ अपने नए घरोंदे का पता -ठिकाना तो दे जाते |
हर तीज -त्यौहार पर भाई-भाभी प्रेम से बुलाते हैं ,मैं जाती हूँ ,वह प्यार दुलार लुटाता है --मैं बटोरती हूँ ,परन्तु एक कमी ,एक कसक ,एक उदासी जाने -अनजाने घेर लेती है बावरे मन को | इतना  प्रेम पाकर भी हर मौके पर नेत्र सजल हो जाते हैं और बहती अश्रु - धारा तुम दोनों की तस्वीर को धुंधला  कर देती है आँखों के समक्ष |    कुछ घाव हैं --रिश्ते हुए जो न जाने क्यूँ भरते नहीं ,वक़्त भी उन पर मलहम नहीं लगा पाता |

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